एक झलक

Sandeep Gupta

“मन है परन्तु शांत है और यह शांति मन से अलग नहीं है अपितु उसी का एक अभिन्न हिस्सा है। मन को मारा नहीं गया है अपितु उसके पार जाया गैया है। SLC का प्रादुर्भाव इसी स्थिति तक आने के लिए किया गया है। मन है परन्तु विचार नहीं है और इसलिए पीड़ा नहीं है। वह पीड़ा जो हमने हर कदम पर सालती है, रिश्तों में कसावट की पीड़ा, समाज और उसको दायित्वों के बंधनो की पीड़ा, नौकरी और उसमे होने की छटपटाहट की पीड़ा और जिंदगी की व्यर्थता की पीड़ा। और यह सारी तकलीफे व्यर्थ है, इनकी जरुरत नहीं, जिन्दंगी इनके बिना हो सकती है। SLC मे हमने इन्ही सारी पीड़ाओं को, झंझटों को, तकलीफों को आगे ला कर देखा और उनका आवेगहीनता से मंथन किया, नदियों के साथ चलते हुए , झील के पास बैठे हुए, पहाड़ों और खाईओं से झांकते हुए , घास के हरे भरे मैदानों और पेड़ो के बीच से खुद को टटोला और पाया की हमारी सारी तकलीफे कितनी खोखली और अर्थहीन है और सिर्फ हमारी बनाई हुई है। योग के साथ आत्मसत होते हुए और भीड़ से दूर जा कर यह पाया की जिन्दंगी कुछ अलग चाहती है। जिंदगी अकेलापन चाहती है, जिंदगी सबसे पहले खुद से अभिन्नता मांगती है और यह हम उसको देते नहीं और इसलिए यह तड़प। SLC एक प्रयास था जिन्दंगी को जिंदगी देने का ना की उसमे कोई मतलब ढूढ़ने का और ना ही लक्षय ढूंढ़ने का। पहली बार लक्षय को हटाना बताया गया और यह एक अनाव्यशयक आवरण था जिसको परे करके हम खुद को पहली बार पा सके। SLC बनाया गया है खुद को समग्रता में पाने के लिए, अपने आपको अ-मन तक ले जाने के लिए। SLC धकेलता है उन गहराईओं और अन्धकार की तरफ जो हमारा हिस्सा तो है लेकिन हम उसको समझ नहीं सके और फिर वो रौशनी की किरण, SLC वो नग्नता है जो हमारा पूरा वजूद हिला देती है और फिर वो शांति और आंसू और कुछ नहीं। SLC डरे हुए और मरे हुए लोगों के लिए नहीं है, उनके लिए है जिनमे अनजान में छलांग लगाने की हिम्मत अभी है। और फिर कुछ भी छिपा हुआ और ढका नहीं, अनंत है और हम है, रौशनी है और हम है, अनंत की गहराइयाँ है और वह अनजान सी, अजीब सी शांति है। SLC उनके लिए नहीं जो हिमालय में भी साथ ढूंढ रहे हैं, SLC एकांगी है, हम है और अनंतता है, और कोई नहीं, किसी की जरूरत भी नहीं।

जिंदगी अब साफ़ और सीधी है, पारदर्शिक है, कोई आवरण नहीं, कोई छुपाव नहीं, SLC के reflection सत्र मैं वही प्रवेश कर सकता है जो डर को देख तो रहा है लेकिन अनजान मैं, अनंत में छलांग लगाने को तैयार है। अभी दुसरो के प्रति दुराव है, शक है लेकिन रामगंगा नदी उसको बहा ले जाने के लिए तैयार है और वह उसके नीले और पारदर्शक और पवित्र जल में कूदने लिए प्रस्तुत है, सहर्ष है और फिर वह रिफ्लेक्शन सत्र में बह जाना, आँख से बाढ़ का उतर आना, ऐसे जैसे पिंडारी ग्लेशियर के मीठे और ठन्डे पानी ने कीचड़ को बहा कर साफ़ कर दिया हो| अंतर्मन का उभर कर आना और आत्मस्थ हो जाना। पहली बार मुक्ति की छोटी सी झलक, SLC को नतमस्तक कर देने का मन हुआ। एक छोटा सा धक्का, थोड़े से नियम और हर दिन नया और अलग, हिमालय का मन और तन को सहला देना और सहसा ही सब कुछ आसान हो गया। SLC सत्र कुछ सिखने के लिए नहीं अपितु जो सीखा हुआ है उसको परे करने का प्रयास है, दिमाग को और क्लिष्ट करना एसएलसी का मकसद नहीं अपितु अ-मन होने की प्रक्रिया का नाम ही एसएलसी है। एसएलसी किताबो और ग्रंथो के पीछे छुपने का नाम नहीं अपितु रहस्यवाद में गोते लगाने की कला है और फिर विस्मित हो जाना है। SLC समाज से अलग थलग करके हिमालय की गुफाओ में तपस्या करना नहीं अपितु संसार में रहते हुए शांति, प्रेम और विस्मयता से जीना है


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